बनगाँव (बिहार )

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बनगांव का लिखित इतिहास काफी पुराना है। ऐसी धारणा है की बुद्ध के समय मे इस जगह का नाम आपन निगम था। ज्ञान की खोज और आध्यात्म के विस्तार के सिलसिले मे गौतम बुद्ध भी यहाँ आये थे। पडोसी गाँव महिषी के मंडन मिश्र और कन्दाहा के प्रसिद्ध सूर्यमंदिर की वजह से ये गाँव और आसपास के क्षेत्र सदियीं से ज्ञान, धर्म और दर्शन के केंद्र रहे हैं। गाँव का नाम बनगांव होने के बारे मे कई किम्वदंतियाँ हैं। कहा जाता है गाँव के सबसे पहले वाशिंदों मे से एक का नाम बनमाली खां था। और उन्ही के नाम से शायद इस गाँव की पहचान बनगांव के रूप मे हुई। गाँव की खासियत से भी है की ये देश का अकेला गाँव है जहाँ के लोगों का हिंदू होने के बावजूद भी उपनाम खां है। बनगांव के प्राचीन इतिहास से सम्बंधित कई उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार राम शरण शर्मा के कई किताबों के संग्रह प्राचीन बिहार का वृहत इतिहास है और उसमे दी गयी जानकारियों को लेखक कुछ महीनो के उपरान्त उपलब्ध कराएँगे. गाँव के कई लोगो ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे सक्रिय सहयोग दिया। वो या तो आन्दोलन मे सक्रिय रूप से संलग्न रहे या फिर कविताओं के माध्यम से समकालीन आंदोलनकारियों को ओजरस देते रहे। स्वर्गीय पंडित छेदी जा द्विजवर ने उन दिनों मैथिल आंदोलकारियों को वीररस की ऐसी ही कविताओं से जोश भरा जैसा की हिंदी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कर रहे थे।

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